Saturday, May 19

Politics का Bear Bar...


वो कहते थे बेटा लाइफ में कितनी ही problem सर पर चढ़कर तांडव भले ही क्यूँ न करने लगे, लेकिन तुम  कभी झूठ  मत बोलना. हमेशा सच का हाथ पकड़ कर आगे बढ़ना और झूठ को पीछे छोड़ देना ...लेकिन   आज सच बोलने पर कुछ समझदार लोग और अपने ही दोस्त "राजा हरिशचंद की छठी औलाद" कह कर खिल्ली उड़ाते हैं मेरी self respect  की धज्जियां उड़ जाती हैं और सिगरेट के धुएं की तरह  झूठ ऊपर उड़ता  जाता हैं और सच राख बन कर नीचे गिरता चला जाता हैं...

वो  कहते थे बेटा राजनीति Bear bar की तरह है बाहर से temptation और अन्दर से कड़वा पानी बिलकुल शराब की तरह. बार- बार politics के bear bar  में तुम्हारा  घुसने का मन करेगा लेकिन अन्दर घुसने के बाद तुम टल्ली हो कर ही बाहर निकलोगे...फिर न  तुम्हें दुनिया नज़र आएगी न दारी ...नज़र आएगा तो सिर्फ यह bear bar ...इसलिए मैं आज तक इस bear bar के आस पास भी नहीं भटकी. लेकिन politics के bear bar के नशे में टल्ली लोग  बार-बार   मुझे पकड़ लेते हैं और मुझे इस भ्रमात्मक bear bar के जाल में फंसा ही देते हैं. और मैं हमेशा की तरह जाल में फस कर खुद का तमाशा बनते देखती हूँ काश मैंने औरों की तरह politics के bear bar की माया को जाना  होता और ज्यादा न सही atleast एक पैक तो लगाया होता.....


Wednesday, May 16

डायरी के पन्नों


डायरी के पन्नों से निकल के आज शब्दों ने बाहर झाँका ...
कहा मुझसे, है तेरी स्याही भ्रम और कलम है धोका ..
क्यूँ वक़्त बेवक्त लिख के इन सोये पन्नों को जगाती है....
नींद तुझे आती नहीं क्यूँ अपनी ख्वाहिशें इन पन्नों पर फरमाती है.? ?

लफ्जों से जो तूने कहा नहीं..क्यूँ बेजुबान कलम से कहलवाती है..
कह भी दे..है आरजू जो तेरी ...उससे ...कहीं वक़्त चिढ़ जाएँ न तुझसे


कैसे कहूं मैं उससे
रातों रातों जग  के मैंने देखें उसके हसीन सपने
खो कर अपने चैन को मैंने पाये उसके बीते लम्हे
आँखों में न नींद न जगने की हसरत है ..
बस उसकी चाहत को तरसते ये नयन है






Sunday, May 13

जगते देखा है

पाप-पुण्य की बनी इस दुनिया में ..
मैंने इन्सान को मिटते देखा है..

 सर्दी की रातों में, मैंने बेबसी की चादर ओढ़े गरीब को ठिठुरते देखा है
 गर्मी की झुलसती धूप में,  मैंने औलाद की भूख मिटाने की चाह लिए,
                                                                                  
  एक माँ को जलते देखा है












 क्या खूब बनायी दुनिया तूने,
पैसों की खातिर इस जहाँ में, मैंने प्यार के रिश्तों को बदलते देखा है
    वक़्त-वक़्त की बात है बस...
 आंधी- तूफ़ान में फंसी  रातों  के सोते ख्वाबों को भी मैंने जगते देखा है...